औरत तो जिन्दगी जीने का एहसास हैं।
औरत को पैरो की धूल समझना इंसान की भूल हैं।
औरत ही बेटी हैं और घर का नूर हैं
बड़े प्यार से पालपोश कर पड़ा लिखाकर बड़ा किया ,
फिर एक दिन किसी अजनबी से ब्याह कर दिया।
ना अपने सपने होते औरत के ना सपने देखने का हक,
चुला चौकी मैं कट जाती ज़िंदगी बाकी बच्चो के संग।
हमेशा सबका ख्याल रखती, दुःख दर्द सब चुपचाप सहती।
सबसे जल्दी उठती, सबसे देर में सोती।
सपने सारे टूट जाते, जब शादी कर दूसरे घर में आती।
मायका कहे पराया धन, ससुराल कहता दूसरे घर से आई।
क्यों नहीं समझते लोग के लड़की के बिना मायके की खुशिया अधूरी,
और बहू बिना हैं ससुराल अधूरा।
दोनों घरों की खुशिया हैं औरत से, जानेगा एक दिन संसार ये पूरा।
